पढ़े लिखे समाज की चार दिवारो का सच ( Hindi Story )

 सच का आइना 

इस कहानी के द्वारा मैं आप लोगों को कुछ संप्पन व पढ़े लिखे दिखने वाले समाज में रहने वाले लोगों की सच्चाइयों की तरफ़ ध्यान दिलाना चाहती हूँ । ये कहानी सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं परंतु इन में कुछ काल्पनिक चरितरो का समावेश भी किया गया है। इन कहानियों को पढ़ कर आप अपने आस-पास ,पास -पड़ोस और रिश्तेदारों में होने वाली घटनाओं पर ध्यान अवश्य ही केन्द्रित कर पाएँगे ।

   आज की कहानी एक आकांक्षा नाम की लड़की के ईद-गिर्द बुना  ताना -बाना है। 

आकाँक्षा एक सुंदर और होशियार युवती है । उसके माता-पिता भी पढ़े-लिखे है । उसकी माँ घर को घर को संभालती हैं । अौर पिता नोकरी करते हैं । आकाँक्षा अौर नवीन दो बहन भाई हैं । आकाँक्षा पढ़ लिखकर नोकरी करना चाहती है । पर उसके मामा के द्वारा एक अच्छे रिश्ते के बताए जाने पर उसके माता पिता भी रिश्ता करने के लिए मान जाते हैं । अौर उसके लिए लड़के को देखने उसके घर चले जातें हैं । वहाँ जाने पर वो देखते हैं कि लड़का बहुत ही संस्कारी ओर सुंदर है ओर घर भी अच्छा है । 

 उस परिवार में लड़के अमित के अलावा उसके माता पिता ओर छोटा भाई सुमित है । अमित एक कम्पनी में अच्छी ख़ासी जॉब करता है । सब कुछ ठीक ठाक लगने पर मामा जी आकाँक्षा के माता पिता को यह कहकर मना लेते है कि एसा लड़का ओर घर बार दुँड़ने पर भी नहीं मिले गा । इसलिए आप लोगों को रिश्ते के लिए हाँ कर देनी चाहिए । आकाँक्षा के माता पिता भी बहुत ख़ुश है ओर हाँ करते हुए लड़के के घर वालों को लड़की देखने का निमंत्रण दे देते हैं । 

घर आकर वे लोग अपने बच्चों को घर ओर लड़के के बारे में सब अच्छे से बताते हैं । आकाँक्षा सारी बातें ध्यान से सुनती है ओर कहती है । 

पर माँ , मुझे तो अपने पैरों पर खड़े होना है।  

माँ कहती है बेटी इतना अच्छा रिश्ता बार बार नहीं मिलता नौकरी तो बाद में  कर सकती हो। 

माँ की बातें सुनकर आकांक्षा विरोध नहीं कर पाती और चुपचाप बात मान लेती है।  

तय समय पर , लड़के के माता पिता और उसका भाई आकांक्षा को देखने आते हैं। उसे देखकर सभी खुश है क्योंकि वह एक सभ्य , सुन्दर , शुशील और प्रभावशाली व्यक्तित्व की धनी लड़की है। 

सभी उसको पसंद करते हैं और उसकी तारीफ हैं।  

सो , रिश्ता पक्का हो जाता है। शादी के बाद आकांक्षा ससुराल जाती है। कुछ दिन अजनबी पन सा महसूस होने के बाद वो खुद को उन के रंग में ढाल लेती है और परिवार के सरे काम अपने हातो में ले लेती है या फिर घर के सारे काम सास उस पर लाद देती है। फिर भी वह चुपचाप सारा दिन घर के कामों  में लगी रहती है।  

पर घर परिवार के किसी भी अहम मसलें की चर्चा में उसको शामिल होने की अनुमति नहीं है।  

क्योंकि उसकी सास के अनुसार बहु को तो घर के काम काज और घर सजाने संवारने के लिए ही लाया जाता है।  बाकी चीजों से उसका कोई लेना देना नहीं है। 

आकांक्षा भी चुपचाप सब कुछ स्वीकार कर तन - मन - धन से सब की सेवा में दिन रात लगी रहती है। 

इस दौरान आकांक्षा गर्भवती होती है और एक बेटी जन्म देती है। अब उसका दैनिक रूटीन और भी व्यस्त हो जाता है | बेटी के तीन साल का होने पर वह फिर से एक बेटी को जन्म देती है। अब वह परिवार के कामों में और अपने बच्चों को पालने में अपने आप को , अपनी पढ़ाई को और कैरियर , सब को दाव पर लगा कर अपना फ़र्ज पूरा करने में लगी रहती है।  

क्योंकि बेटियों को बचपन से ही शिक्षा दी जाती है कि अपनों को संभालना उसका परम धर्म है। 

कई बार जब वह कुछ पलों के लिए अकेली होती है तो उसके मन में कई विचार बिजली की तरह क्रोंध जाते हैं और वह मन मसोच कर रह जाती है। और कुछ ही पलो में फिर से व्यस्त हो जाती है। अब आकांक्षा पहले की तरह सुन्दर , प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी नहीं रही अब उसके चहरे का तेज और रौनक कहीं खो गई है। अब वह देखने में चलती फिरती मशीन बन गई है , जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं है , अपने कोई विचार , अपनी कोई राय नहीं है।  सिर्फ वह घर का काम करने के लिए ही पैदा हुई है।  जिसके लिए ना कोई sunday और ना ही कोई सरकारी छुट्टी का दिन है जिस पर उसे एक दिन का अवकाश मिल सके और वो अपने बारे में सोच सके। 

एक एक दिन कब  हफ्ता , महीना , साल बन गया आकांक्षा को पता ही नहीं चला कि कब साल पर साल गुजर गए  उसे तो बस दिन और रात का हिसाब था और जल्दी उठकर घर के काम , सास ससुर की सेवा , पति का ध्यान रखना , देवर की ख्वाहिश पूरी करने तक होश था। 

उसकी शादी को आठ साल हो चुके थे। अब उसके देवर की भी शादी की बात होने लगी है। आकांक्षा  सोचती है कि घर में देवरानी आएगी तो उसका हाथ बटाएगी घर के कामों में , तो वह भी यह सोच कर खुश है। 

पर उसके देवर की शादी से पहले उन्हें घर को बदलना होगा अभी वह दो कमरे के घर  में रहते हैं। एक कमरा नई बहू के लिए भी चाहिए जो उसकी सास ने अमित को नया घर खरीदने की हिदायत दे दी है। और अब घर में सुबह शाम नए घर लेने के बारे में चर्चा होती रहती है। पर आकांक्षा इन सब से अनजान है कि घर में क्या चर्चा होती है। पर वह यह समझ रही थी कि किसी महत्वपूर्ण विषय पर बात चीत होती है। 

वह अपनी बात अमित से भी नहीं करपाती थी। पहले तो उसके पास अमित से कुछ कहने सुनने के लिए समय नहीं होता था अपितु अमित ने भी , कभीभी , किसी भी विषय पर उससे बात करना जरूरी नहीं समझा , अमित उससे बेहद  प्यार करता है और कभी उसे किसी भी चीज़ के लिए तंग नहीं रखा , उसे जरुरत की हर चीज़ समय से पहले ही ला देता था। आकांक्षा को भी कभी  कुछ मांगने की जरुरत नहीं होती थी। 

पर अब आकांक्षा की सास ने आचानक आकांक्षा को मायके भेजने की सोची और उसकी  माँ व भाई को उसे घर ले जाने के लिए बुला लिया। 

जब आकांक्षा की माँ और भाई घर आये , आकांशा को ये बात तब पता चली पर वह घर में क्लेश होने के डर से चुप थी। उसकी माँ आते हुए , आकांक्षा , उसके बच्चों , सास ससुर व दोनों भाइयों के लिए ढ़ेर सारे महंगे उपहार ले कर  आई। जिसे देखकर उसकी सास फूली नहीं समा रहीं थीं। 

आकांशा काम में व्यस्त यहीं सोच रही थी कि ये सब क्या चल रहा है। सासु माँ ने उसकी माँ और भाई को क्यों बुलाया है। 

अमित और सुमित भी जॉब से घर आ चुके थे खाना खाने के बाद सभी हॉल में बैठ कर बात कर रहे है। 

पर आकांक्षा की सास सुमित के साथ कमरे में बैठी है। 

जब आकांक्षा चाय लेकर उन्हें देने जाती है तो वह उन दोनों की बात सुनती है। 

उसकी सास सुमित को बताती है कि उसने ही आकांक्षा के माँ और भाई को बुलाया है ताकि वे आकांक्षा को कुछ समय के लिए अपने घर ले जा सके , और उसके बाद वे नया घर ख़रीद सके और उसकी रेजिस्टरी अपने नाम करवा सके। क्योंकि उस  सास को लगता है कि अगर आकांक्षा यहाँ रही तो कहीं वो अमित को बहकाकर घर अपने नाम ना करवाले क्योंकि घर के लिए दिया जाने वाला पैसा अमित की कमाई से ही जाएगा। 

ये सारी बातें सुनकर आकांक्षा स्तब्ध रह गई , वह ना तो कमरे में जा सकती थी और ना ये सब अपने पति , माँ , या भाई को बता सकती थी। 

पर आज उसे रह रह कर अपने आठ सालों की तपस्या पर खीज आ रही थी जिसे वो अपना मानकर , दिन रात सेवा करती थी 'असल' में वो उसे अपना मानते ही नहीं थे , वो तो केवल बिना पगार लिए काम करने वाली नौकरानी मात्र थी जो आँख , कान सब बंद करके दिन रात काम में लगी रहती थी। ना तो उसके पति को उसकी भावनाओं का बोध था और ना ही उसके सास ससुर को , वह तो अपनी तकलीफ को अपनी माँ और भाई के साथ भी साँझा नहीं कर सकती थी। 

ये कैसी विडम्बना है कि जो लड़की अपना घर , माँ-बाप , भाई-बहन , सखी-सहेली , यहाँ तक कि अपना गाओ शहर सब कुछ छोड़ कर ससुराल आती है [फिर भी ससुराल के लोग दिल से अपनाते नहीं है।

लड़की घर के काम काज , सास ससुर की सेवा , पति की सेवा , ननद देवर का ध्यान रखना , सब करती है पर फिर वो उस घर में पराई है। 

निष्कर्ष :  यह है कि यह आज के समाज की कड़वी सच्चाई है कि लड़की आज भी ससुराल में पराई है। 

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